हवा वह अनदेखा पदार्थ है जो हमारे चारों ओर है। उसका कोई रंग नहीं, अपनी कोई गंध नहीं, और प्रकाश उसके पार सीधा निकल जाता है — इसीलिए हम भूल जाते हैं कि वह वहाँ है। पर वह सचमुच का पदार्थ है, जैसा इस अध्याय के प्रयोग साबित करेंगे, और वह क़ीमती है: तुम्हारी हर साँस उसी का एक घूँट है।
उदाहरण
उदाहरण 10.2 (इसे करके देखो: थोड़ी हवा पकड़ो)
प्लास्टिक की थैली को पूरा खोलो, उसे कमरे में एक झटके से घुमाओ, और मुँह ऐंठकर बंद कर दो। थैली गद्दे की तरह फूली खड़ी रहती है — उसे दबाओ: वह वापस धकेलती है! भीतर कुछ न कुछ साफ़ तौर पर क़ैद है। एक कोना खोलकर फिर दबाओ: वह अनदेखा क़ैदी तुम्हारी उँगलियों पर से बहता हुआ निकलता महसूस होता है। “ख़ाली” थैली, जिसमें कुछ भी न हो, वापस धकेल ही नहीं सकती थी।
उदाहरण 10.3 (हवा ख़ुद को कहाँ दिखाती है)
हवा अनदेखी है, पर उसकी शरारतें नहीं: गरम सड़क के ऊपर वह लहराती दिखती है, पतंगें उठाती है, पत्तों को खड़खड़ाती है, और पानी के भीतर जहाँ भी निकल भागे वहाँ बुलबुले बनाती है। गिलास में नली से फूँक मारो: हर चाँदी-सा बुलबुला ऊपर जाती हवा की एक नन्ही पुड़िया है।
उदाहरण 10.5 (गड़गड़ाती बोतल)
“ख़ाली” बोतल को मुँह नीचे करके टब में डुबोओ और ज़रा-सा तिरछा करो: गड़ाक, गड़ाक, गड़ाक — चाँदी-से बड़े बुलबुले सतह की ओर दौड़ते हैं, और उनकी जगह भीतर पानी ले लेता है। बोतल हवा से भरी थी; पानी उतनी ही तेज़ी से भीतर आ सकता है जितनी तेज़ी से हवा बाहर जाए। रसोई के सिंक पर सुनाई देने वाली वह गड़गड़ाहट हवा और पानी के जगह बदलने की आवाज़ है।