किसी जंतु का आवास वह तरह की जगह है जहाँ वह स्वाभाविक रूप से रहता है और उसे हर ज़रूरी चीज़ मिलती है: भोजन, पानी, ओट, और अपने बच्चों के लिए एक सुरक्षित कोना। तालाब, जंगल, मैदान, बाड़ और समुद्र-तट, सब आवास हैं।
उदाहरण
उदाहरण 11.2 (चार आवास, चार मोहल्ले)
तालाब में: मेंढक, व्याध-पतंगे, काँटा-मछलियाँ, तालाब के घोंघे। जंगल में: गिलहरियाँ, हिरन, कठफोड़वे, जंगली चींटियाँ। मैदान में: ख़रगोश, टिड्डे, तितलियाँ, खेत के चूहे। पुरानी दीवार के पत्थरों के नीचे: कठ-जूएँ, मकड़ियाँ, और कभी-कभी ऊपर धूप सेंकती एक छिपकली।
उदाहरण 11.5 (छछूँदर का साज़-सामान)
छछूँदर ज़मीन के नीचे रहता है, मैदान के नीचे ख़ुद खोदी सुरंगों में। उसके हाथ चौड़े खोदने वाले फावड़े हैं, उसके रोम दोनों दिशाओं में चपटे लेटते हैं ताकि मिट्टी उन्हें कभी उलझा न सके, और अँधेरे में उसकी कमज़ोर आँखों से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता। ज़मीन के ऊपर वह भद्दा है; अपने आवास में वह उस्ताद है।
उदाहरण 11.8 (स्कूल का तालाब)
एक स्कूल अपने अहाते के कोने में छोटा-सा तालाब खोदता है। दो साल के भीतर उस पर व्याध-पतंगे गश्त लगाते हैं, पानी पर जल-चींटे चलते हैं, और मेंढक आकर बस जाते हैं — उन्हें कोई लाया नहीं। आवास बना दो, और बाशिंदे ख़ुद उसे ढूँढ़ लेते हैं।