प्रवास करना यानी हर साल, ऋतुओं के बदलने के साथ एक इलाक़े से दूसरे इलाक़े की यात्रा करना — सर्दी से पहले गरम देशों की ओर निकल जाना, जहाँ भोजन बचा रहता है, और वसंत में लौट आना। अबाबील, सारस और क्रौंच प्रवासी हैं; कुछ हज़ारों किलोमीटर चलते हैं, और ठीक उसी घोंसले तक लौटने का रास्ता खोज लेते हैं।
उदाहरण
उदाहरण 20.9 (वसंत सब कुछ उलट देता है)
मार्च और अप्रैल में क्रम उलट जाता है: कीट लौट आते हैं, प्रवासी अपने पुराने घोंसलों पर फिर दिखने लगते हैं, शीतनिद्रा वाले दुबले और भूखे जागते हैं, शीतकालीन आवरण उतर जाते हैं। ऋतुएँ घूमती हैं, और जंतुओं का पंचांग उनके साथ घूमता है — अगले पतझड़ अबाबीलें फिर तारों पर क़तार बाँधेंगी।