पृथ्वी दिन में एक बार अपनी जगह घूमती है, और साथ ही एक विशाल यात्रा सूर्य के चारों ओर भी करती है — एक पूरा चक्कर एक वर्ष लेता है, यानी लगभग दिन। इस चक्कर के दौरान हमारे आकाश में सूर्य की राह धीरे-धीरे ऊपर उठती और नीचे उतरती है, और हम चार ऋतुओं से गुज़रते हैं: वसंत, ग्रीष्म, शरद, शिशिर — और फिर वसंत, चक्कर-दर-चक्कर।
示例
उदाहरण 18.7 (चार पहर)
ग्रीष्म: ऊँचा सूर्य, लंबे दिन, दोपहर की छोटी छायाएँ। शिशिर: नीचा सूर्य, छोटे दिन, दोपहर की लंबी छायाएँ। वसंत और शरद इनके बीच बैठते हैं — और उनमें से हर एक में एक ख़ास दिन आता है जब दिन और रात बराबर लंबे होते हैं। पुराने ज़माने के किसान, नाविक और राजगीर यह पंचांग सीधे आकाश से पढ़ना सीख गए थे।
उदाहरण 18.3 (छाया से ऋतु पढ़ना)
दोपहर वाली छाया की लंबाई ऋतु के साथ बदलती है: गरमी में, जब सूर्य लगभग सिर के ऊपर होता है, किसी खंभे की दोपहर वाली छाया एक छोटा ठूँठ भर होती है; जाड़े में, जब सूर्य नीचा टँगा रहता है, वही खंभा दोपहर में लंबी छाया डालता है। महीने में एक बार दोपहर वाली छाया की नोक ज़मीन पर निशान लगाओ, और साल भर में वे निशान किसी सुस्त लोलक की तरह आगे-पीछे रेंगते दिखेंगे।