एक ही गुणसूत्र के दो जीन सहलग्न हैं: उनके युग्मविकल्पी साथ-साथ युग्मकों में जाने की ओर झुके रहते हैं, और कोई द्विसंकर जनकीय युग्मक (, ) पुनर्संयोजी युग्मकों (, ) से अधिक बनाता है। पुनर्संयोजी तभी उठते हैं जब दोनों स्थलों के बीच कोई जीन-विनिमय पड़े, इसलिए उनकी बारंबारता — जो किसी परीक्षण संकरण में सीधे गिनी जाती है — वही दूरी मापती है: 0 (पूर्ण सहलग्नता) से (इतने दूर के, या भिन्न गुणसूत्रों के, जीन कि वे स्वतंत्र रूप से अपव्यूहित हों) तक फैलता है। मानचित्र-दूरी का मात्रक सेंटीमॉर्गन (cM) है: निकट सहलग्न जीनों के लिए पुनर्संयोजन है; मनुष्य में लगभग दस लाख क्षारक युग्म है। सहलग्नता ही पहला प्रमाण थी कि जीन गुणसूत्र पर एक पंक्ति में बैठे हैं।
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