कोई एककोशिकीय सुकेंद्रकी तीन में से एक ढंग से, या एक साथ दो ढंगों से, पोषण पाता है। प्रकाशपोषण: उसके पास हरितलवक हैं और वह प्रकाश तथा से अपना कार्बनिक पदार्थ स्वयं बनाता है (हरी शैवाल, डायटम, डाइनोफ्लैजेलेट)। भक्षपोषण: वह कणों को — जीवाणुओं को, दूसरे प्रोटिस्टों को — किसी भोजन-रसधानी में निगल लेता है, जहाँ लयनकाय के एंजाइम उन्हें पचा देते हैं (अमीबा, पक्ष्माभी, कॉलरकशाभी)। परासरणपोषण: वह घुले हुए अणुओं को अपनी झिल्ली के आरपार सोखता है, प्रायः बाहर एंजाइम स्रावित करने के बाद (खमीर, अनेक परजीवी)। मिश्रपोषी, जैसे Euglena, उजाले में प्रकाशसंश्लेषण करते हैं और अँधेरे में खाते हैं। प्राक्केंद्रकी भक्षण नहीं कर सकते: भित्ति मना करती है, और इसीलिए कोई प्राक्केंद्रकी निगलकर परभक्षी कभी नहीं बना।
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