ध्वनि वह है जो हम तब सुनते हैं जब कोई चीज़ कंपन करती है और उसकी थरथराहट हवा में से होकर हमारे कानों तक पहुँचती है। कंपन करने वाली चीज़ उस ध्वनि का स्रोत है — कोई तार, ढोल की खाल, कोई घंटी, या तुम्हारा अपना गला।
उदाहरण
उदाहरण 19.5 (हर जगह ध्वनि के स्रोत)
हर ध्वनि के पीछे का कंपन ढूँढ़ो: गिटार — छेड़ी हुई तारें थरथराती हैं; ढोल — चोट खाई खाल थरथराती है; तुम्हारी आवाज़ — फेफड़ों की हवा तेज़ी से निकलते समय गले की दो नन्ही झिल्लियाँ थरथराती हैं (यही वह भनभनाहट है जो तुम्हारी उँगलियों ने महसूस की); भनभनाती मक्खी — उसके पंख हर सेकंड सैकड़ों बार थरथराते हैं; ज़ोर से बंद किया दरवाज़ा — पूरा दरवाज़ा और उसकी चौखट पल भर के लिए काँप उठते हैं।
उदाहरण 19.6 (तेज़ ध्वनि यानी बड़ा कंपन)
तने हुए रबर बैंड को हल्के-से छेड़ो: छोटा-सा धुँधलापन, धीमी टनक। उसे ज़ोर से छेड़ो: चौड़ा धुँधलापन, तेज़ टनक। स्रोत जितने ज़ोर से थरथराता है — यानी उसका आगे-पीछे होना जितना चौड़ा होता है — ध्वनि उतनी ही तेज़ होती है। चावल के दानों को भी देखो: हल्की थाप उन्हें सिहरा देती है, ज़ोरदार धमाका उन्हें हवा में उछाल देता है।
उदाहरण 19.9 (एक ताली की यात्रा)
मैदान के उस पार कोई साथी ताली बजाता है। ताली हवा को थरथरा देती है; वह थरथराहट हवा में हर दिशा में फैलती है, ठीक वैसे जैसे तालाब में गिरे कंकड़ के चारों ओर छल्ले; उसका कुछ हिस्सा तुम्हारे कान तक पहुँचता है और कान की नन्ही झिल्ली को थरथरा देता है — और तुम्हें ताली सुनाई देती है। स्रोत, यात्रा, कान: आज तक तुमने जो भी ध्वनि सुनी है उसने यही सफ़र किया है। यह सफ़र कितना तेज़ होता है, और किन-किन चीज़ों में से गुज़र सकता है? अगले साल का ध्वनि वाला अध्याय ठीक यही सवाल उठाता है।