प्राक्केंद्रकी कोशिका (जीवाणु, आर्किया) में केंद्रक नहीं होता: उसका DNA, जो प्रायः एक वर्तुल गुणसूत्र है, कोशिकाद्रव्य के उस क्षेत्र में रहता है जिसे केंद्रकाभ कहते हैं, और उसमें झिल्ली से घिरे कोई कक्ष नहीं होते। वह छोटी होती है () और उसकी सीमा एक प्लाज़्मा झिल्ली तथा उसके बाहर एक कोशिका भित्ति बनाती है। सुकेंद्रकी कोशिका (प्रोटिस्ट, कवक, पौधे, जंतु) अपना DNA कई रैखिक गुणसूत्रों के रूप में एक दोहरी झिल्ली से घिरे केंद्रक के भीतर रखती है, और अपने कोशिकाद्रव्य को झिल्ली से घिरे कोशिकांगों में बाँटती है (अध्याय 6)। वह बड़ी होती है () और उसके पास प्रोटीन तंतुओं का एक आंतरिक कंकाल होता है।
उदाहरण
उदाहरण 5.7 (सुकेंद्रकी कोशिका कक्षों में क्यों बँटी है)
की किसी कोशिका का आयतन किसी जीवाणु से एक हज़ार गुना है, पर उसकी झिल्ली-सतह केवल सौ गुना (प्रतिज्ञप्ति 1.6)। झिल्लियाँ ही वे जगहें हैं जहाँ कोशिका अपनी ऊर्जा-रूपांतरक शृंखलाएँ और अपने अभिगमन तंत्र रखती है; और सुकेंद्रकी जीव झिल्लियाँ अपने भीतर मोड़कर सतह वापस पाता है — किसी सूत्रकणिका की भीतरी झिल्ली, अंतर्द्रव्यी जालिका की चादरें — और इसके साथ उसे अलग-अलग कक्ष भी मिल जाते हैं, जिनमें असंगत रसायन (लयनकाय में पाचन, कोशिकाद्रव में संश्लेषण) साथ-साथ चल सकते हैं।
उदाहरण 5.11 (एक जीवाणु और एक सूत्रकणिका)
प्रकाश सूक्ष्मदर्शी में पर कोई E. coli कोशिका दृष्टिपटल के पैमाने पर लंबी एक छड़ है, जिसका भीतर कुछ नहीं दिखता; और सूत्रकणिका विभेदन की सीमा पर एक बिंदु है। किसी TEM काट में वही जीवाणु अपनी दोनों झिल्लियाँ, अपनी भित्ति, फीके तंतुमय क्षेत्र के रूप में अपना केंद्रकाभ और गहरे कणों के रूप में अपने राइबोसोम दिखाता है; और सूत्रकणिका अपनी दोहरी झिल्ली तथा भीतरी झिल्ली की तहें दिखाती है। इनमें से कोई जीवित नहीं है।