दो तरंग-स्रोत कलासंबद्ध तब हैं जब उनकी आवृत्ति एक हो और वे क़दम-से-क़दम मिलाकर कंपन करें — व्यवहार में, जब वे एक ही तरंग को बाँटकर बनाई गई दो प्रतियाँ हों। जिस बिंदु तक दोनों पहुँचती हों, उसके लिए पथांतर है।
उदाहरण
उदाहरण 22.12 (यंग का दो-झिरी वाला प्रयोग)
किसी अपारदर्शी पट्टी में मिलीमीटर के अंश भर की दूरी पर दो महीन झिरियाँ , बनाइए और दोनों पर एक ही लेज़र डालिए: यही दो कलासंबद्ध स्रोत हैं। दो-एक मीटर दूर रखे परदे पर उनका अध्यारोपण धारीदार दिखता है: बीच में , चमकीला; परदे पर ऊपर चढ़ते जाइए और बढ़कर (अँधेरा), (चमकीला) … हो जाता है — यानी वहाँ अँधेरा, जहाँ प्रकाश में प्रकाश जोड़ने पर वह कट जाता है।
उदाहरण 22.18 (साबुन की झिल्ली और तेल की परत)
साबुन की झिल्ली पर पड़ता प्रकाश कुछ उसके अगले फलक से परावर्तित होता है और कुछ पिछले से: यही दो कलासंबद्ध प्रतियाँ हैं, जिनका पथांतर मोटाई और देखने के कोण से तय होता है। हर मोटाई कुछ तरंगदैर्घ्यों को बढ़ाकर लौटाती है और बाक़ी को काट देती है: इसलिए झिल्ली जैसे-जैसे बहकर पतली होती जाती है, उसका परावर्तित रंग सरकता जाता है। गीली सड़क पर तेल की परत भी यही खेल खेलती है।