आदर्श प्रतिरूप यह मान लेता है: (क) किसी भी निवेश में कोई धारा नहीं घुसती, (अनंत निवेश प्रतिबाधा); (ख) निर्गम अपना विभवांतर लाद देता है, चाहे उससे कितनी भी धारा खींची जाए (शून्य निर्गम प्रतिबाधा); (ग) अनंत लब्धि, । रैखिक व्यवस्था () में तीसरी मान्यता यह लाद देती है कि
यानी दोनों निवेश एक ही विभव पर बैठते हैं (एक “आभासी लघुपथ”), हालाँकि उनके बीच कोई धारा नहीं बहती।