घिरनी रस्सी के लिए बनी नाली वाला एक पहिया है। स्थिर घिरनी किसी शहतीर से लटकी रहती है और सिर्फ़ खिंचाव की दिशा बदलती है: नीचे खींचो, बोझ ऊपर जाता है। चल घिरनी रस्सी पर सवार रहती है और बोझ उसी में टँगा होता है: तब बोझ रस्सी की दो लड़ों से लटकता है, और हर लड़ भार का सिर्फ़ आधा हिस्सा उठाती है।
उदाहरण
उदाहरण 31.4 (घिरनियाँ काम पर)
झंडा अपने डंडे पर ऊपर चढ़ता जाता है जबकि तुम्हारे हाथ आराम से नीचे की ओर खींचते हैं: ऊपर लगी स्थिर घिरनी — दिशा बदली, मेहनत उतनी ही, पर नीचे खींचने में तुम्हारा अपना भार भी मदद करता है। राजगीरों की घिरनी-मालिका कई घिरनियाँ जोड़ देती है, ताकि बोझ चार या छह लड़ों से लटके: तब हर लड़ भार का चौथाई या छठा हिस्सा उठाती है, और अकेला मज़दूर पियानो चढ़ा देता है। पर मज़दूर को देखो: उसके हाथों में से मीटर-दर-मीटर रस्सी दौड़ती जाती है, जबकि पियानो धीरे-धीरे ऊपर सरकता है।
उदाहरण 31.9 (नियम की जाँच)
चल घिरनी: तुम्हारा हाथ आधे बल से खींचता है, और बोझ को ऊपर उठाने के लिए तुम्हें रस्सी खींचनी पड़ती है — दोनों लड़ों को एक-एक मीटर छोटा होना ही है। सब्बल: तुम्हारा सिरा लंबी चाप में झुकता है, और चट्टान बमुश्किल हिलती है। ढलान: पेटी उसी ऊँचाई तक पहुँच जाती है, पर तुमने उसे पूरी ढलान भर धकेला है। हर बचत का दाम चुकाया गया, वह भी ठीक-ठीक।