दोनों नाभिक धनात्मक हैं: छूने के लिए उन्हें पहले अपने विद्युत प्रतिकर्षण की पहाड़ी चढ़नी पड़ती है (अध्याय 14) — यानी कूलॉम अवरोध। केवल के आसपास ही टक्करें उसे पार करने लायक़ ऊर्जा ढोती हैं; और तब ईंधन नंगे नाभिकों और इलेक्ट्रॉनों का प्लाज़्मा बन चुका होता है। विखंडन को यह चुंगी नहीं चुकानी पड़ती: उसका पलीता, न्यूट्रॉन, उदासीन है और ठंडे में ही काम कर देता है।
उदाहरण
उदाहरण 33.19 (सूर्य इसी पर चलता है)
सूर्य का क्रोड पर साधारण हाइड्रोजन को क़दम-दर-क़दम संलयित करता है — यानी प्रोटॉन–प्रोटॉन शृंखला, जिसका शुद्ध असर है और प्रति हीलियम लगभग : यानी हाइड्रोजन के द्रव्यमान का ऊर्जा बनकर निकल जाता है। जिस धूप का वर्णक्रम हम अध्याय 2 में पढ़ते हैं वह यही द्रव्यमान है, आठ मिनट की देर से पहुँचा हुआ; और हर तारा वक्र पर लोहे की ओर चलकर ही चमकता है।