किसी पदार्थ का गलनांक वह ताप है जिस पर वह पिघलता है — और वही ताप है जिस पर उसका द्रव वापस जमता है। पानी के लिए यह है। हर पदार्थ का अपना गलनांक होता है: चॉकलेट लगभग पर पिघलती है (यानी मुँह के ताप पर — यह संयोग नहीं, किसी भी चॉकलेट बनाने वाले से पूछ लो), मोमबत्ती का मोम लगभग पर, और लोहा तो पर ही।
उदाहरण
उदाहरण 21.3 (दो संख्याओं से दुनिया पढ़ना)
चॉकलेट की पट्टी दुकान की ताक़ पर () ठोस क्यों रहती है, पर गरमियों की चढ़ाई में जेब के भीतर () द्रव हो जाती है? क्योंकि उसका गलनांक, लगभग , इन दोनों के बीच पड़ता है। कोई पदार्थ अपने गलनांक से नीचे ठोस रहता है, उससे ऊपर द्रव — और अपने क्वथनांक तक, जहाँ वह गैस बनकर निकल जाता है। किसी भी पदार्थ की, किसी भी ताप पर, पूरी कहानी ये दो संख्याएँ बता देती हैं।
उदाहरण 21.9 (मोमबत्ती और ढलाईघर)
अँगीठी के पास रखी मोमबत्ती ढुलककर टपकने लगती है: मोम लगभग पर अपना गलनांक पार कर लेता है। ढलाईघर में कारीगर दहकते नारंगी द्रव लोहे को सूप की तरह उँडेलते हैं — उनकी भट्ठी पार कर चुकी है। खेल वही, पर मील-पत्थर बिलकुल अलग: जो काम अँगीठी मोम के साथ कर देती है, लोहे के साथ वही काम सिर्फ़ भट्ठी कर सकती है। और सोना पर पिघलता है: सुनारों को यह संख्या हज़ारों वर्षों से पता है, डिग्रियों में न सही, अपने हाथों में तो सही।