अघूर्णी प्रवाह में वेग किसी वेग विभव से व्युत्पन्न होता है: (तब किसी पथ पर का परिचालन केवल पथ के सिरों पर निर्भर करता है, )। यदि प्रवाह असंपीड्य भी हो, तो : अर्थात् विभव लाप्लास समीकरण का पालन करता है, ठीक वैसे ही जैसे आवेश-रहित प्रदेश में स्थिरवैद्युत विभव — यह विभव प्रवाह कहलाता है। किसी बंद वक्र पर वेग का परिचालन है।
उदाहरण
उदाहरण 2.15 (तीन समतल प्रवाह)
(क) स्थगन प्रवाह : , , ; धारा-रेखाएँ , अर्थात् अतिपरवलय — अक्ष के पास दीवार से टकराती धार। (ख) बिंदु भँवर (समतल ध्रुवीय निर्देशांक): असंपीड्य और को छोड़ हर जगह अघूर्णी, (बहुमानी), और केंद्र के चारों ओर किसी भी वृत्त पर परिचालन है — अर्थात् भ्रमिलता अक्ष पर संकेंद्रित है। (ग) रैंकिन भँवर: वाला क्रोड ठोस घूर्णन में (भ्रमिलता ) और उसके बाहर बिंदु भँवर से जुड़ा हुआ: यही बवंडर, टब की भँवरी या पुल के खंभे के पीछे के भँवर का प्रतिरूप है — वेग क्रोड के किनारे पर अधिकतम होता है।