कुछ भोजन आँखों से न दिखने वाले सजीवों — यानी सूक्ष्मजीवों — को किसी कच्चे माल पर काम पर लगाकर बनाए जाते हैं। उनका खाना उस माल को बदल देता है: इसी बदलाव को किण्वन कहते हैं, और मनुष्य इसे हज़ारों साल से चला रहे हैं, यानी तब से जब किसी को यह पता तक नहीं था कि ये मज़दूर होते भी हैं।
उदाहरण
उदाहरण 43.5 (रोटी फूलती है)
रोटी का कच्चा गूँधा हुआ आटा आटे और पानी का होता है — और साथ में खमीर, यानी एककोशिकीय कवक (टिप्पणी 29.9 में ऐसे ही जीवन से भेंट हुई थी)। खमीर आटे की शक्कर पर पलता है और एक गैस छोड़ता है; और उस गैस के बुलबुले लचीले आटे में फँसकर उसे फुला देते हैं — नानबाई इसी को फूलना कहता है। फिर ओवन की गरमी मज़दूरों की पाली ख़त्म कर देती है और उनका काम जमा देती है: भीतर के छेद खमीर के ही दस्तख़त हैं।
उदाहरण 43.6 (दूध दही और पनीर बनता है)
सही सूक्ष्मजीवों का जामन डाला हुआ गरम दूध रात भर में जमकर दही बन जाता है: मज़दूर दूध की शक्कर पर पलते हैं और एक अम्ल छोड़ते हैं, और वही अम्ल दूध को जमा देता है — वह ताज़ा खटास ही वह अम्ल है। पनीर भी इसी तरह शुरू होता है, पर आगे जाता है: दही को दबाया, नमक लगाया और महीनों पकाया जाता है, और उस पकने के दौरान सूक्ष्मजीव काम करते रहते हैं — किसी पनीर के छेद, ऊपरी परत और तेज़ महक उनकी लंबी पाली का ही रोज़नामचा हैं।

